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यूरोपीय व्यापार का प्रारम्भ

भारत की व्यापारिक सम्पदा से आकृष्ट होकर अनेक (Beo notes) यूरोपीय जातियों का ध्यान भारतीय व्यापार की ओर आकृष्ट हुआ. इन यूरोपीय जातियों ने भारत से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किए उनके व्यापारिक प्रयत्नों के परिणामस्वरूप अनेक यूरोपीय जातियाँ यथा-पुर्तगाली, अंग्रेज, डच, डेनिश एवं फ्रांसीसी जाति भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आईं और भारत में यूरोपीय व्यापार का प्रारम्भ हुआ।

 

यूरोपीय व्यापार का आगमन

1. पुर्तगाली-1498 ई

2. अग्रेज-1600 ई

3. डच-1602 ई

4. डैनिश-1616 ई

5. फ्रांसीसी-1664 ई

 

भारत में पुर्तगालियों का आगमन

जब 1453 ई में कस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो गया तो यूरोप व भारत के मध्य स्थल मार्ग नहीं रहा यूरोपीय देश समुद्री मार्ग की खोज में लग गए 1498 ई में वास्को-डि-गामा भारत आया उसके भारत में आने के साथ ही एक नए युग का प्रारम्भ हुआ अब भारत और पुर्तगाल के बीच में व्यापार प्रारम्भ हो गया पुर्तगाली व्यापारियों ने भारत में कालीकट गोआ, दमन, दीव एव हुगली के बदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की

परिणामस्वरूप पुर्तगाल के व्यापार में अधिकाधिक वृद्धि हुई वास्को-डि-गामा ने अपनी यात्रा के व्यय का 60 गुना लाभ कमाया 1505 ई में फ्रांसिस्को द अल्मीडा पहला पुर्तगाली गवर्नर जनरल बनकर भारत आया उसने भारत में जल सामरिक शक्ति का बेहतर विकास किया अल्मीडा के पश्चात् 1509 ई. में अलबुकर्क भारत में पुर्तगाली गवर्नर जनरल बनकर आया उसने 1510 ई में बीजापुर के सुल्तान युसुफ आदिलशाह से गोआ छीन लिया गोआ पर अधिकार करके उसे पुर्तगाली सत्ता एव संस्कृति का केन्द्र बनाया व्यापारियों को गोआ में बसने के लिए प्रोत्साहित किया।

 

व्यापारिक उन्नति के साथ ही पुर्तगालियों ने भारत में सैन्य शक्ति का संगठन एव विकास किया उन्होंने भारत में किलेबंदी प्रारम्भ कर दी और भारत की राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगे

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भारत में डचों का आगमन

पुर्तगालियों को मिले व्यापारिक लाभ से प्रोत्साहित होकर हॉलैण्ड निवासी, जिन्हें डच कहा जाता है, ने अपना ध्यान भारत की ओर केन्द्रित किया उनका पहला व्यापारिक बेड़ा मलाया द्वीप समूह में आया केप ऑफ गुड होप होते हुए भारत में 1596 में आने वाला कॉरनेलिस डे हस्तमान प्रथम डच नागरिक था डचों के भारत आने के पश्चात् पुर्तगालियों से व्यापारिक प्रतियोगिता हुई 1602 ई में भारत में डच इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई शीघ्र ही डचों ने मसाले के व्यापार पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और धीरे-धीरे उन्होंने पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया 1641 ई में डचों ने मलक्का पर अधिकार कर लिया

 

1652 ई में श्रीलका में पुर्तगालियों के प्रभाव को समाप्त कर अपने अधिकार में कर लिया और दक्षिण भारत में अपने प्रभाव में वृद्धि की डचों ने भारत में मुसलीपट्टम पुलीकट सूरत विमलीपट्टम मछलीपट्टम, भडौच, कैम्बे अहमदाबाद कोचीन, चिनसुरा, कासिम बाजार पटना . बालासौर, आगरा, तमिलनाडु, कोचीन आदि में अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए डचों ने भारत में व्यापार की ओर अधिक ध्यान दिया उन्होंने यहाँ की राजनीति में न तो कभी हस्तक्षेप किया और न ही रुचि ली डचों का दक्षिण-पूर्वी एशिया में अधिक ध्यान रहा परिणामस्वरूप धीरे धीरे भारत में उनकी ख्याति कम होने लगी तथा अन्य यूरोपीय जातियों का प्रभाव बढने लगा।

भारत में अंग्रेजों का आगमन

भारत में अग्रेजो के आगमन के समय इगलैण्ड में महारानी एलिजाबेथ शासन कर रही थीं अन्य यूरोपीय जातियों को भारत में व्यापारिक लाभ मिलता देखकर अंग्रेज भी भारत की ओर आकृष्ट हुए अतः अंग्रेजों ने 31 दिसम्बर, 1600 ई में महारानी. एलिजाबेथ से भारत में व्यापार करने के लिए आज्ञापत्र प्राप्त किया और भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना कर व्यापार प्रारम्भ कर दिया प्रारम्भ में अंग्रेजी व्यापारियों को 15 वर्ष के लिए आज्ञा-पत्र प्रदान किया गया था, किन्तु उन्होंने धीरे धीरे भारतीय व्यापार पर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लिया और भारत की राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगे 1608 ई में कप्तान हॉकिन्स इगलैण्ड के राजा जेम्स प्रथम से आज्ञापत्र लेकर मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में आया

 

1613 ई में सूरत में अग्रेजों की व्यापारिक कोठी की स्थापना हुई 1615 ई में सर टामस रो. व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के उद्देश्य से मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार आगरा में आया और यहाँ तीन वर्ष तक रहा प्रारम्भ में मुगल दरबार में पुर्तगालियों का अधिक प्रभाव होने के कारण उसे अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं हुई, किन्तु अंततः वह शहजादा खुर्रम से व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में सफल हुआ अब अंग्रेजों को भड़ौच, अहमदाबाद तथा आगरा में व्यापारिक कम्पनियाँ स्थापित करने का आज्ञा-पत्र मिल गया 1640 ई में अंग्रेजी कम्पनी ने मद्रास में एक सुदृढ़ दुर्ग की स्थापना की तथा 1662 ई में बम्बई पर अपना अधिकार कर लिया शीघ्र ही अंग्रेजों ने 1686 में कलकत्ता में भी व्यापारिक कम्पनी की स्थापना की भारत में अंग्रेजों का डचों तथा फ्रांसीसियों से व्यापारिक संघर्ष हुआ,

 

जिसमें अग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई मुगल साम्राज्य के पतन के पश्चात तो अंग्रेजों का भारत के राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रभाव बढ़ा हॉलैण्ड तथा पुर्तगाल यूरोप के दुर्बल राष्ट्रों में थे अतः वे अंग्रेजों के आगे न टिक सके और व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता से बाहर हो गए अब अंग्रेजों की केवल फ्रांसीसियों से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा थी इन दोनों राष्ट्रों के मध्य 1763 ई तक संघर्ष चला 1756-63 के सप्तवर्षीय युद्ध में फ्रास का पराभव हो गया कनाडा पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तथा भारत में भी उन्होंने फ्रांसीसियों को परास्त कर दिया इसके उपरांत भारत में एकमात्र शक्ति अंग्रेज ही रह गए और उनके व्यापार को चुनौती देने की क्षमता किसी अन्य में न रही. धीरे-धीरे अंग्रेजों का भारतीय व्यापार पर पूर्णरूपेण अधिकार हो गया

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 भारत में डैनिश का आगमन

 

भारत में 1616 ई में डेनमार्क निवासी जिन्हें डैनिश कहा जाता है, का आगमन हुआ डैनिश भी भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आए थे यहाँ आकर उन्होंने ट्रावनकोर एव श्रीरंगपट्टम में अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए, किन्तु परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण डैनिश व्यापारियों ने अपने व्यापारिक केन्द्र अंग्रेजों को बेच दिए और भारत से वापस चले गए भारत में उनके आगमन का कोई
विशेष महत्व नहीं रहा ।

 

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन

अन्य यूरोपीय जातियों की तरह 1664 ई में फ्रांसीसी व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आए उन्होंने ‘फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की यह एक सहकारी कम्पनी थी इस पर व्यापारियों का नियंत्रण न होकर राजा का पूर्ण नियंत्रण था, जबकि अन्य यूरोपीय कम्पनी पर व्यापारियों का नियंत्रण था फ्रांसीसियों का मुख्य उद्देश्य भारत में व्यापार कर पूँजी एकत्र कर मेडागास्कर में उपनिवेश स्थापित करना था यद्यपि भारत में सबसे बाद में फ्रांसीसी आए थे, किन्तु यहाँ के राजनीतिक षड्यंत्रों में उन्होंने सर्वप्रथम भाग लिया फ्रांसीसियों ने सूरत एवं मुसलीपट्टम में व्यापारिक केन्द्र स्थापित किए फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने तो भारत में अपना राज्य स्थापित करना चाहा, परिणामस्वरूप फ्रांसीसियों एव अंग्रेजों के मध्य संघर्ष हुआ दोनों शक्तियों के मध्य तीन युद्ध हुए इन्हें कर्नाटक युद्ध कहा जाता है अतः में 1760 ई में वांडीवाश के युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को बुरी तरह परास्त कर दिया 1763 ई में यूरोप में पेरिस की संधि के साथ ही ‘सप्तवर्षीय युद्ध समाप्त हो गया. इसके साथ ही भारत सदा के लिए फ्रांसीसी शक्ति का प्रभुत्व समाप्त हो गया और अंग्रेजों की शक्ति में लगातार वृद्धि होती गई धीरे-धीरे भारत में वह एकमात्र यूरोपीय शक्ति के रूप में रह गई, जिसने भारत पर अनेक वर्षों तक शासन किया

 

भारत में यूरोपीय जातियों के आगमन के कारण

निम्नलिखित कारणोंवश उपर्युक्त वर्णित यूरोपीय जातियाँ भारत आईं इन जातियों ने भारत को व्यापारिक केन्द्र बनाया यहाँ से व्यापार कर अपने देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया तथा अधिकाधिक व्यापारिक लाभ अर्जित किया

1. भारत आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न देश था यहाँ की आर्थिक सम्पन्नता ने यूरोपीय व्यापारियों को आकर्षित किया

2. यूरोपीय बाजार में भारतीय मसालों की प्रचुर मात्रा में माँग थी. यहाँ के मसाले यूरोप में अधिकाधिक मात्रा में बिकते थे

3. वेनिस और जिनोआ के व्यापारियों ने यूरोप एवं एशिया के व्यापार पर अपना अधिकार कर लिया था वे स्पेन तथा पुर्तगाली व्यापारियों को हिस्सा देने के लिए तैयार न थे

4. वास्को-डि-गामा द्वारा भारत आने का सुगम जलमार्ग खोज लेना यूरोपीय व्यापारियों के लिए लाभकर रहा

5. भारत निर्मित मिट्टी के बर्तनों की यूरोपीय देशों में व्यापक स्तर पर माँग थी

6. 1453 ई में कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने के कारण यूरोप व भारत के बीच स्थल मार्ग बन्द हो गया अतः यूरोपीय देश समुद्री मार्ग की खोज में लग गए शीघ्र ही उन्हें भारत आने का सरल जलमार्ग भी मिल गया

7. भारत में कुटीर उद्योग एव कच्चे माल की अत्यधिक संभावना का होना

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