tgt/pgt/12th biology notes pdf in hindi-organic evolution of life

BIOLOGY-NOTES-IN-HINDI

tgt/pgt/12th biology notes pdf in hindi-organic evolution of life

लैमार्कवाद (Lamarckism)

फ्रांस के प्रसिद्ध प्रकृति वैज्ञानिक (biology notes in hindi) जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 में एक पुस्तक ‘फिलोसफिक जुलोजिक (Philosophic Zoologique)’ में जैव विकास के संबंध में अपने सुप्रसिद्ध सिद्धांत की घोषणा की। लैमार्क के सिद्धांत को उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत (Theory of Inheritance of Acquired Characters) भी कहते हैं। लैमार्क का सिद्धांत निम्न तथ्यों पर आधारित है



वातावरण का सीधा प्रभाव

प्रत्येक प्राणी पर वातावरण का सीधा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण उसकी संरचना व स्वभाव में परिवर्तन होता है।

 

अंगों के कम या अधिक प्रयोग का प्रभाव

किसी अंग का निरंतर उपयोग उस अंग को अधिक शक्तिशाली तथा क्रियाशील बनाता है जबकि कम उपयोग के कारण अंगों की वृद्धि रुक जाती है तथा उनका ह्रास होने लगता है। ये अंग अवशेषी अंगों (Vestigial Organ) के रूप में रह जाते हैं या लुप्त भी होने लगते हैं। इस धारणा के कारण लैमार्कवाद को “अंगों के कम या अधिक उपयोग का सिद्धांत” भी कहा जाता है।




उपार्जित लक्षणों की वंशागति-(biology notes in hindi)

लैमार्कवाद के अनुसार, कोई भी प्राणी अपने जीवनकाल में जितने भी गुण (लक्षण) अर्जित करता है, वे सभी उसकी आने वाली पीढ़ी में वंशागत हो जाते हैं। ऐसे लक्षणों को उपार्जित लक्षण तथा इनके संतान में पहुँचने की क्रिया को उपार्जित लक्षणों की वंशागति कहते है।

 

डार्विनवाद (Darwinism)

चार्ल्स डार्विन के जैव विकास के संबंध में विचार विस्तारपूर्वक उनकी पुस्तक ‘Origin of Species by Natural Selection’ (प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का विकास) में सन् 1859 में प्रकाशित हुए। डार्विनवाद के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

जीवों में संतानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता

प्रत्येक जीव-जाति में संतानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, फल-मक्खी डोसोफिला एक बार में 200 अंडे देती है जिनसे 10-14 दिन में मक्खियां बन जाती हैं। यदि सभी अंडों से उत्पन्न मक्खियां जीवित रहें और जनन करें तो 40-45 दिनों में इनकी संख्या लगभग 20 करोड़ हो जाएगी।

 

जीवन-संघर्ष-(biology notes in hindi)

संतानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता के बावजूद प्रकृति में प्रत्येक जाति के जीवधारियों की संख्या लगभग स्थिर रहती है। इसका कारण यह है कि जीवधारियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने, वृद्धि करने व जनन करने के लिए भोजन, प्रकाश, वास-स्थान, जनन के लिए साथी आदि की आवश्यकता होती है। परंतु ये सब प्रकृति में सीमित हैं। अतः जीवधारियों को पैदा होते ही इनके लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह संघर्ष तीन प्रकार का हो सकता है-(i) सजातीय संघर्ष (Inter-specific), (ii) अंतर्जातीय (Inter-Specific) संघर्ष, (iii) वातावरणीय (Environmental) संघर्ष

 

विभिन्नताएं एवं उनकी वंशागति

संसार के सभी जीवधारियों में विभिन्नताएं पाई जाती है। एक ही माता-पिता की संतानें भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होती है। विभिन्नताएं केवल रंग-रूप में ही नहीं बल्कि विभिन्न लक्षणों के लिए हो सकती हैं जैसे कि दौड़ने की शक्ति, रोगों  से लड़ने की शक्ति, कार्य करने की क्षमता आदि। जो भिन्नताएं किसी जीवधारी का – अस्तित्व बनाए रखने में सहयोगी होती हैं, वे लाभदायक विभिन्नताएं अगली  पीढ़ियों में पहुँचती हैं।



योग्यतम की उत्तरजीविता प्राकृतिक वरण (Survival of the fittest and Natural Setpotion

जीवन-संघर्ष में वही जीवधारी सफल होते हैं जिनमें परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्नताएं होती हैं। ये पनपते हैं और जनन करके जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। अधिक-से-अधिक अनुकूल लक्षणों वाले जीवधारियों (योग्यतम) का एक प्रकार से प्रकृति  द्वारा वरण होता है। इसी को योग्यतम की उत्तरजीविता. या प्राकृतिक वरण कहते हैं।

 

नई जातियों की उत्पत्ति-(biology notes in hindi)

वातावरण या परिस्थितियां निरंतर बदलती रहती हैं। फलस्वरूप निरंतर नए : लक्षणों का प्राकृतिक वरण होता रहता है। उपयोगी विभिन्नताएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी इकट्ठी  होती रहती हैं और काफी समय बाद (सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद) उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारी से इतने भिन्न हो जाते हैं कि एक नई जाति बन जाती है।

 

 उत्परिवर्तनवाद (Mutation Theory

 

ह्यगो डी व्रीज (Hugo de Vries) नामक वैज्ञानिक ने सन् 1901 में यह सिद्धांत दिया। उनके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) बड़ी विभिन्नताओं (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है।

जैव विकास की प्रक्रिया को समझने के लिए जो सिद्धांत प्रस्तावित किये गए, उनमें उत्परिवर्तनवाद का अपना एक विशिष्ट महत्व है। इस सिद्धांत के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं

(i) नई जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के परिणामस्वरूप होती है, न कि छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं में प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय व क्रमिक  विकास के फलस्वरूप।

(ii) सभी जीवजातियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जो कभी  कम या अधिक या सुप्त हो सकती है।

(iii) जाति का पहला सदस्य जिसमें परिवर्तित लक्षण दिखाई पड़ता है, उत्परिवर्तक कहलाता है।

(iv) उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये किसी एक अंग विशेष में अथवा अनेक अंगों में एक साथ उत्पन्न हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अंग अचानक लुप्त  हो सकते हैं या अधिक विकसित हो सकते हैं।

(v) एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

(vi) उपर्युक्त उत्परिवर्तनों के फलस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते हैं जो जनक से इतने अधिक भिन्न हों कि उन्हें एक नई जाति माना जा सके।



जैव विकास की पुष्टि हेतु प्रमाण(Evidences for Organic Evolution

जैव विकास की सत्यता निम्न प्रमाणों पर आधारित है

जीवाश्म विज्ञान से प्रमाण 

प्राचीन चट्टानों में तत्कालीन जीवधारियों के बचे हुए अवशेषों को जीवाश्म कहते हैं। वास्तव में, किसी भी वस्तु या चिन्ह जिससे किसी जीवधारी की भूतकाल में उपस्थिति प्रमाणित होती है, को जीवाश्म कहा जा सकता है। इनके अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान कहते हैं। विभिन्न आयु की चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि सबसे प्राचीन चट्टानों में सरलतम प्राणियों तथा वनस्पतियों के जीवाश्म मिलते हैं, जैसे-स्पंज, मूंगा, कवक, शैवाल, आदि। इनके बाद की चट्टानों में मछलियों, जलस्थलचरी जंतु तथा फर्न व अनावृतबीजी पौधों के जीवाश्म पाए जाते हैं। इनके बाद की चट्टानों में दैत्याकार डाइनासोर तथा अनावृतबीजी पौधों के जीवाश्मों की बहुलता है। सबसे बाद बनी चट्टानों में मनुष्य, अन्य स्तनधारी जंतु तथा आवृतबीजी पौधों के जीवाश्म मिलते हैं। स्पष्ट है कि सरलतम जीवों से धीरे-धीरे जटिल जीवों का विकास हुआ।




भ्रूण विज्ञान से प्रमाण-(biology notes in hindi)

विभिन्न कशेरुकी जंतुओं के भ्रूण के परिवर्धन की विभिन्न प्रावस्थाओं का अध्ययन करने पर उनमें अभूतपूर्व समानताएं देखने को मिलती हैं। उदाहरण के तौर पर-(i) मेंढक का टैडपोल छोटी मछली के समान होता है। इसमें गिल दरारें और पूंछ होते हैं। यह जल में मछली के समान तैरता है और श्वसन भी मछली की भाँति करता है। इससे संकेत मिलता है कि मेंढक व अन्य जलस्थलचर जंतुओं का विकास मछलियों जैसे पूर्वजों से हुआ। (ii) मेंढक, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारियों यहाँ तक कि मानव में भी प्रारंभिक भ्रूणावस्था में गिल दरारें व द्विकोष्ठी हृदय पाए जाते हैं। परंतु, जैसे-जैसे इनका परिवर्धन आगे बढ़ता है, गिल दरारें लुप्त हो जाती हैं, फेफड़े विकसित हो जाते हैं और हृदय भी वयस्क जंतुओं की भाँति हो जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि मेंढक ही नहीं बल्कि अन्य उच्च कशेरुकी जंतुओं का विकास भी मछली या मछली जैसे पूर्वजों से हुआ।

 

तुलनात्मक आकारिकी एवं शारीरिकी से जैव विकास का प्रमाण

जंतुओं में दो प्रकार की संरचनाएं मिलती हैं—(a) समजात अंग तथा (b) समवृत्ति अंग। इन दोनों से ही जैव विकास की पुष्टि होती है।

समजात अंग-(biology notes in hindi)

वे अंग जो संरचना में तो समान होते हैं, कार्य में चाहे भिन्न हों, समजात अंग कहलाते हैं। इनकी इस समानता को समजातता कहते हैं। उदाहरण के लिए-सील के फ्लीपर, चमगादड़ के पंख, घोड़े की टांग, बिल्ली का पंजा तथा मनुष्य के हाथ की मौलिक रचना एक जैसी होती है। इन सभी में ह्यमेरस, रेडियो-अल्ना, कार्पल्स, मेटाकार्पल्स आदि अस्थियां होती हैं। इनका भ्रौणिकीय विकास भी एक-सा ही होता है। परंतु, इन सभी का कार्य अलग-अलग होता है। सील का फ्लीपर तैरने के लिए, चमगादड़ के पंख उड़ने के लिए, घोड़े की टांग दौड़ने के लिए तथा मनुष्य का हाथ वस्तु को पकड़ने के लिए अनुकूलित होता है। समवृत्ति अंग __ऐसे अंग जो समान कार्य के लिए उपयोजित हो जाते हैं तथा एक-से दिखाई देते हैं परंतु, मूल रचना व भ्रूणीय परिवर्धन में भिन्न होते हैं, समवृत्ति अंग कहलाते हैं तथा इस समानता को समरूपता कहते हैंसमवृत्ति अंगों के उदाहरण निम्नलिखित हैं 

(i) पंखतितली, पक्षियों तथा चमगादड़ के पंख उड़ने का कार्य करते हैं और देखने में एकसमान लगते हैंपरंतु, इन सभी की उत्पत्ति अलगअलग ढंग से होती हैकीटों के पंख की रचना शरीर भित्ति के भंज द्वारा, पक्षियों के पंख की रचना इनके अग्रपादों पर परों द्वारा, चमगादड़ के पंख की रचना हाथ की चार लंबी उंगलियों तथा धड़ के बीच फैली त्वचा से हुई है

(ii) पखने, फ्लीपर तथा प्पूमछलियों के पखने, सील के फ्लीपर तथा ढेल के चप्पू जल में तैरने का कार्य करते हैंअतः समान प्रतीत होते हैं परंतु मूल रचना में ये बहत भिन्न होते हैं। 

(iii) कुछ पौधों में, जैसे रस्कस (Ruscus) में, तना चपटा होकर पत्ती जैसा आकार ले लेता है और पत्ती की भाँति कार्य भी करता हैयह भी समवृत्ति का उदाहरण है

 


योजक कड़ी से प्रमाण –(biology notes in hindi)

अनेक जीवजातियों से जीवधारियों के एक समूह से दूसरे समूह के विकास के प्रमाण मिलते हैंऐसे जीवधारियों को योजक कड़ियाँ कहते हैंइनमें आर्किओप्टेरिक्स (Archaeopteryx), प्रोटोप्टेरस (Protopterus) तथा प्लेटीपस (Platypus) आदि शामिल हैं। 

(i) आर्किओप्टेरिक्स इस प्रकार की योजक कड़ी का जीवंत उदाहरण हैआर्किओप्टेरिक्स एक प्राचीन विलुप्त प्राणी है जिसे सरीसृपों तथा क्षी वर्ग के बीच की कड़ी मानते हैं क्योंकि समें पक्षी था सरीसृप दोनों के लक्षण हैंसरीसृपों की भाँति इसमें लंबी पूंछ, मुख में दांत तथा अग्रपादों में पंजे पाए जाते हैंइसके विपरीत, पक्षियों की भाँति परों से इनका शरीर ढका था तथा इनके अग्रपाद पंखों में विकसित थे इनकी चोंच पाई जाती थीइससे यह सिद्ध होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ। 

(ii) इसी प्रकार प्रोटोप्टेरस में मत्स्य तथा जलस्थलचर दोनों वर्गों के लक्षण मिलते हैं जिससे सिद्ध होता है कि जलस्थलचर जीवों का विकास मत्स्य वर्ग से हुआ है। 




(iii) प्लेटीपस में सरीसृप और स्तनी वर्ग के लक्षण मिलते हैं जो यह इंगित करते हैं कि स्तनी वर्ग के जंतुओं का विकास भी सरीसृपों से हुआ है

अवशेषी अंगों से प्रमाण –(biology notes in hindi)

प्राणियों के शरीर में कुछ ऐसे अंग होते हैं जिनका कोई कार्य नहीं होताफिर भी ये रचनाएं हजारों वर्षों से पीढ़ीदरपीढ़ी चली रही हैंऐसे अंगों को अवशेषी अंग (Vestigial Organs) कहते हैंऐसा समझा जाता है कि पूर्वजों में ये अंग क्रियाशील थे किंतु परिवर्तनों के कारण अब इन जंतुओं में इनका कोई उपयोग नहीं रहा तथा फलस्वरूप ये निष्क्रिय हो गए। 



(i) मनुष्य में ही लगभग 100 अवशेषी अंग पाए जाते हैंइनमें निमेषक पटल, कर्णपल्लवों की पेशियां, कृमिरूप परिशेषिका, पुच्छ कशेरूकाएं, त्वचा के बाल अकल दाढ़ शामिल हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि निमेषक पटलधारी जीव (मेंढक जैसे जलस्थलचारी), कान हिलाने वाले जंतु (गाय, घोड़ा, बिल्ली, वानर), शरीर पर ताप नियंत्रण हेतु बालयुक्त स्तनधारी (कुत्ता, बिल्ली, गाय, कपियों जैसे जीव) तथा सक्रिकृमिरूप परिशेषिका वाले घास खाने वाले जंतु (खरगोश, गाय, भैंस, वानर की भाँति) मानव के पूर्वज रहे होंगे। 

(ii) इसी प्रकार अजगर के पैर नहीं होते परंतु उदर भाग में पश्च पादों के अवशेषांग दो छोटीछोटी हड्डियों के रूप में त्वचा के नीचे ड़े रहते हैंयह प्रमाणित करता है कि सर्यों का विकास संभवतः मेखलायुक्त सरीसृपों से हुआ है

 

हेकेल का बायोजेनेटिक नियम

यह तो मानी हुई बात है कि हर जीव, भ्रूण से उत्पन्न होता है और प्रत्येक भ्रूण | केवल एक ही कोशिका (निषेचित अंड) से बनता है। किसी एक जीव के परिवर्धन (development) की अवस्थाओं को व्यक्तिवृत्त (Ontogeny) कहते हैं। इनमें से कुछ। | अवस्थाएं वही होती हैं जो उसके पूर्वजों (Ancestors) के परिवर्धन में थीं। किसी जीव के परिवर्धन में, उसके अपने पूर्वजों की परिवर्धन-अवस्थाओं में से गुजरने को या दोहराने को जातिवृत्त (Phylogeny) कहते हैं। प्रत्येक जीव अपने परिवर्धन में अपने | पूर्वजों के समान ही विकास करता है तथा अपनी जाति के विकास को दोहराता है| | (Ontogeny repeats Phylogeny) यह नियम (Biogenetic law) जर्मन वैज्ञानिक  हेकेल (Haeckel; 1834-1919) ने 1866 में बनाया था।

 

विकास यात्रा

बिग बैंग 

लगभग साढ़े तेरह बिलियन वर्ष पहले इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महाविस्फोट (BigBang) से हुई।

आर्कियोजोइक-(biology notes in hindi)

 

इस युग में ज्वालामुखी उद्गार होते रहे और इस समय की चट्टानों , में कुछ कार्बनिक पदार्थों का संचय हुआ। कभी-कभी इस युग को । तमजीवी युग (Cryptozoic Era) भी कहा जाता है क्योंकि इस युग के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

प्रोटीरोजोइक

इस युग में भी ज्वालामुखी उद्गार होते रहे और अवसादी चट्टानों का निर्माण होता रहा। इसमें प्रारंभिक जीवन जैसे आदिम शैवाल व कवक

, और कुछ एक कोशिकीय जलीय प्राणी बने।

कैब्रियन

इस अवधि में भूमि पर जीवन नहीं था लेकिन जलीय शैवाल और । अपृष्ठवंशी (Invertibrates) थे। इस युग में शैवालों और जलीय प्राणियों के जीवाश्म उपलब्ध हैं।

आडोविशियन

इस युग में जलीय शैवालों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ स्थल वनस्पति का भी विकास हुआ। इस समय के प्राणियों में कौरल, कृमि, मोलस्क, इकाइनोडर्मेट्स और प्रारंभिक मत्स्य शामिल हैं।

सिलुरियन

इस अवधि में बड़े-बड़े सागरों का निर्माण हुआ और इस दौर के शैवाल व स्थल-वनस्पति के स्पष्ट प्रमाण हैं। प्राणियों में मोलस्क के अलावा

बिच्छू, मकड़ी, पंख रहित कीट और लंग फिश का निर्माण हुआ।

डेवोनियन

इस युग में छोटे-छोटे सागर बनकर कुछ स्थलीय भाग उभरे। स्थलीय वनस्पति का काफी प्रसार हुआ और जिम्नोस्पर्म बने। प्राणियों में हर तरह की मछलियों और आरंभिक एम्फीबिया का निर्माण हुआ।

काबोनिफेरस

इस दौरान लाइकोपोड्स और हार्सटेल्स के अलावा बीजधारी फर्न्स के अनेक वन भी थे। प्राणि-जगत् में एम्फीबिया विशेष प्राणी थे। इसलिए इसे एम्फीबिया काल भी कहा जाता है।



परमियन 

इस अवधि में जिम्नोस्पर्मे फैलते गए और हार्सटेल्स आदि कम होते गए। प्राणियों में एम्फीबिया कम होते गए और कीट व रेप्टाइल्स का  प्रसार शुरू हो गया।

ट्रियासिक

इसमें मरुस्थल बने, बीजधारी फर्क्स समाप्त होने लगे और जिम्नोस्पर्स का प्रसार घटने लगा। प्राणियों में रेप्टाइल्स का प्रसार हुआ और स्टेगोसॉरस व टाइरेनोसॉरस जैसे डाइनासोरों का विकास हुआ। समुद्र में मछलियों का बहुत अधिक प्रसार हुआ।

जुरासिक

इसमें एंजियोस्पर्म व द्विबीजपत्री का प्रसार हुआ। प्राणियों में विशालकाय रेप्टाइल्स व छिपकलियों आदि के अलावा दाँतों वाले W= वाले पक्षी आर्कियोप्टेरिक्स व आदिम स्तनी का भी विकास हुआ।

क्रिटेशियस

इसी अवधि में दुनिया की कई प्रसिद्ध पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण हुआ। जिम्नोस्पर्स घटे व एकबीजपत्री पौधे पहली बार बने। प्राणियों में विशालकाय रेप्टाइल्स का अंत हुआ और आधुनिक मछलियाँ, साँप, पक्षी व निम्न श्रेणी के स्तनियों का विकास हुआ।

पेलियोसीन

इसमें आदिम स्तनियों का प्रसार हुआ।

इयोसीन

इस युग में मैदानी प्रदेश फैलते गए और उच्च स्तनियों, जैसे घोड़े, का विकास हुआ।

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ओलिगोसीन

इस अवधि में वनों का प्रसार हुआ और पुष्पीय पौधों ने बहुत उन्नति की। उच्च स्तनियों का प्रसार होता गया।

मीयोसीन

इसमें संभवतः आदिम वानर मानव का विकास हुआ।

प्लीयोसीन

 

इस युग में पृथ्वी पर महत्वपूर्ण बदलाव हुए। घास स्थलों का बहुत विकास व प्रसार हुआ और वन घटते गए। आधुनिक स्तनियों का विकास !

शुरू हुआ।

प्लेस्टोसीन

इस दौरान अनेक पुरानी जीव-जातियाँ नष्ट हो गईं और आधुनिक मानव का विकास शुरू हो गया।

होलोसीन

इस युग को ही वास्तव में मानव का युग कहा जाता है। 25,000 साल पहले शुरू हुए इस युग में शाकीय पौधे बढ़ते रहे और विशाल काष्ठीय वृक्ष घटते चले गए। मानव ने जल, थल, वायु पर विजय पा ली।

 

40 लाख साल पूर्व एक थे मानव और चिंपैंजी

एक नए अध्ययन में पाया गया है कि 40 लाख साल पहले तक मानव और चिंपैंजी के पूवर्ज एक ही थे। अब तक यह माना जा रहा था कि दोनों प्रजातियां-50 से 70 लाख साल पहले अलग हुई थीं। इस संबंध में डेनमार्क स्थित आरहुस यूनिवर्सिटी और ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के )/ रिसर्चरों ने मानव, चिंपैंजी, गुरिल्ला और औरंगऊटैन के लाल डीएनए की तुलना की। इन वैज्ञानिकों ने ‘आणविक घड़ी’ का इस्तेमाल कर यह पता लगाया कि मानव जाति अन्य स्तनधारियों से कब अलग हुई।

वैज्ञानिकों के अनुसार औरंगऊटैन (biology notes in hindi) तकरीबन 1 करोड़ 80 लाख साल पहले अलग हुए थे। इस हिसाब से चिंपैंजी और मानव के बीच विभेद 40 लाख साल पहले हुआ, होगा।

‘आणविक घड़ी’ इस सिद्धांत पर काम करती है कि सभी प्राणियों के डीएनए में एक तय अवधि के अंदर उत्परिवर्तन (आकस्मिक बदलाव) होता है। हालांकि, यह प्रकिया निरंतर नही चलती और समान अवधि के भीतर भी ऐसा नही होता है। लेकिन, इससे “विकास के क्रम का सही पता लगाया जा सकता है।

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विशेषज्ञ शुरू से ही इस बात पर सहमत रहे हैं कि लाखों साल पहले मानव और चिंपैंजी के पूर्वज एक थे। उनके मुताबिक औरंगऊटैन और गुरिल्ला उससे भी समान शाखा से ही अलग हो गए थे। लेकिन, इसकी सही अवधि का पता लगाना हमेशा ही मुश्किल रहा है।

मैसाचुसेटस इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में ब्रांड इंस्टिट्यूट के डेविड रीच और हावर्ड मेडिकल स्कूल के जिनेटिक्स डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में बताया गया था कि मानव और चिंपैंजी के बीच अलगाव संभवतः 40 लाख साल पहले शुरू हुआ था। हालांकि, उनके मुताबिक – यह प्रक्रिया तकरीबन 54 लाख साल पहले पूरी हुई थी। रीच के शोध के मुताविक अलग होने से पहले कई हजार साल तक मानव और चिंपैंजी के पूर्वजों ने आपस में यौन संपर्क किया था। इसी वजह से चिपैंजी और मानव के डीएनए में कई मानताएं पाई जाती हैं और दोनों के तकरीबन 96 प्रतिशत डीएनए मिलते-जुलते है।

 

तकरीबन एक साल पहले जॉर्जिया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की सूजिन यो और साथियों ने भी कहा था कि गोरिल्ला और औरंगऊटैन के बयान चिपैंजी genetics के तौर पर मानव के ज्यादा करीब हैं। उनके मुताबिक मानव के अंदर विशिष्ट मानवीय गुणों का विकास महज 10 लाख साल पहले हुआ था। इन गुणों में लंबी उम्र और लंबी बाल्यावस्था शामिल हैं। इसी कारण मनुष्य अन्य प्राणियों की अपेक्षा काफी उम्र तक यौन संबंध बनाने के योग्य हो पाता है।



 

 

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