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सल्तनतकालीन कृषि एवं राजस्व व्यवस्था

अक्ता

यह एक विशेष प्रकार की भूमि थी जो सैनिक एवं सैनिक (BLOCK EDUCATION OFFICER NOTES) अधिकारियों को दी जाती थी. इसके पाने वाले भूमि के लगान का उपभोग तो कर सकते थे, किन्तु वे उसके मालिक नहीं होते थे. जिन्हें इस प्रकार की भूमि दी जाती थी, उन्हें मुक्ता, अमीर कहा जाता था.

खालसा

वह भूमि, जिसका प्रबन्ध सुल्तान द्वारा किया जाता था, उसे खालसा भूमि कहते थे. इस भूमि पर प्रत्यक्ष रूप से केन्द्र का नियन्त्रण होता था.

अनुदान

वह भूमि जो पुरस्कार, उपहार, सेवानिवृत्त एवं धार्मिक अनुदान के रूप में दी जाती थी. उसे अनुदान भूमि कहा जाता था. इस प्रकार की भूमि पर कोई कर नहीं लगाया जाता था.

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चौथे प्रकार भूमि के अन्तर्गत ऐसी भूमि आती थी, जो परम्परागत राजाओं और जमींदारों की हुआ करती थी. इस भूमि से सुल्तानों को वार्षिक कर मिलता था.

राजस्व (कर) व्यवस्था

सल्तनतकाल में मुख्य रूप से पाँच प्रकार के कर प्रचलित थे, जोकि इस प्रकार थे-1. उश्र, 2.खराज, 3. खम्स, 4. जकात, 5. जजिया.

उश्र

मुसलमानों से वसूल किए जाने वाले भूमिकर को उश्र कर कहा जाता था, जोकि भूमि की उपज पर लगाया जाता था. इस कर की वसूल करने की दर 10% एवं 5% थी. प्राकृतिक साधनों से सींची जाने वाली भूमि पर 10% एवं मनुष्यकृत साधनों से सींची जाने वाली भूमि से उपज का 5% कर वसूल किया जाता था.

 

खराज

 

वह कर जो गैर-मुसलमानों से वसूल किया जाता था, उसे खराज कहते थे, अगर खराज देने वाली भूमि को मुसलमान जोतता था, तो उससे भी खराज वसूल किया जाता था. कर के वसूल करने की दर 2/3 से अधिक तथा 1/3 भाग से कम नहीं होती थी.

 

खम्स

यह लूट में प्राप्त धन अथवा भूमि में गढ़े हुए खजानों से प्राप्त धन पर वसूलकिया जाता था. यह कर सम्पत्ति का 1/5 भाग था. इस पर सुल्तान का अधिकार था तथा शेष 4/5 भाग को सैनिक अधिकारियों में बाँट दिया जाता था, किन्तु अलाउद्दीन खलजी एवं मुहम्मद तुगलक ने 4/5 भाग राजकोष में जमाकर दिया तथा 1/5 भाग सैनिकों में बाँट दिया था.

 

जकात

यह धार्मिक कर था जोकि केवल धनवान मुसलमानों से वसूल किया जाता था. यह आय का 2.5% होता था. वसूल किए गए इस कर को मुसलमानों के लाभार्थ हेतु व्यय किया जाता था.

जजिया

यह कर गैर-मुसलमानों, जिन्हें जिम्मी कहा जाता था, से वसूल किया जाता था. इसके बदले में सरकार जिम्मियों की सम्पत्ति आदि की रक्षा का दायित्व अपने ऊपर लेती थी. जिम्मियों को तीन वर्गों में रखा गया था. इन वर्गों को क्रमश: 12, 24 एवं 48 दिरहम कर के रूप में देने पड़ते थे. ब्राह्मण, स्त्रियाँ, बच्चे, भिखारी, लंगड़े, अंधे, साधु, पुजारी तथा वृद्धजनों से यह कर नहीं लिया जाता था. ऐसे व्यक्ति जिनकी आय का कोई साधन नहीं था, को भी इस कर से मुक्त रखा गया था. फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली के ब्राह्मणों पर भी यह कर लगाया था. इस कर को सुल्तानों ने इस भय से कि कहीं बहुसंख्यक हिन्दू जनता विरोध न कर दे कठोरता से वसूल नहीं किया.

 

लगान व्यवस्था

 

बटाई

बटाई अर्थात् कृषक की उपज को अथवा उसके मूल्य को बटाना. यह लगान निर्धारण की एक प्रणाली थी, जोकि सल्तनतकाल में प्रचलित थी. बटाई तीन प्रकार की होती थी-1.खेतबटाई, 2. लंक बटाई, 3. रास बटाई.

1.खेत बटाई

तैयार फसल अथवा फसल बोने के तुरन्त बाद ही सरकार का हिस्सा निर्धारित हो जाता था.

2.लंक बटाई

भूसे से अलग किए बिना ही कटी हुई फसल का कृषक व सरकार के मध्य बँटबारा किया जाता था.

3.रास बटाई

इस प्रकार की बटाई में अनाज को भूसे से अलग करने के पश्चात् अनाज का हिस्सा निर्धारित किया जाता था. – बटाई प्रणाली को अधिकांश उसी क्षेत्र में लगू किया जाता था. जिस क्षेत्र पर सल्तनत का प्रत्यक्ष शासन होता था.

मुक्ताई

सल्तनतकाल में लगान निर्धारित करने की मिश्रित प्रणाली को ‘मुक्ताई’ के नाम से जाना जाता था.

नाप-जोख

कर निर्धारण का यह एक अन्य तरीका था, जिसके अन्तर्गत भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर उपज और उस पर कर
निर्धारित किया जाता था. इस प्रणाली को सल्तनतकाल में अलाउद्दीन खलजी ने लागू किया. सल्तनतकाल में इस प्रणाली को ‘मसाहत’ के नाम से जाना जाता था.

उक्त वर्णित राजस्व एवं लगान व्यवस्था का निर्धारण सुल्तानों द्वारा इस प्रकार करने का प्रयास किया गया था कि कृषि की उन्नति हो तथा कृषक व राज्य के मध्य सामंजस्य बना रहे. अलाउद्दीन खलजी ने भू-राजस्व से सम्बन्धित पटवारियों के अभिलेखों को जाँचने की पद्धति प्रारम्भ की. उसने मूल्य नियंत्रण के सफल क्रियान्वयन हेतु अनाज के रूप में भू-राजस्व लेने को प्राथमिकता दी.

 

फिरोज तुगलक ने कृषि को उन्नत बनाने के लिए सराहनीय प्रयास किए. उसने भूमि के गुणात्मक सुधारों की ओर विशेष ध्यान दिया. उसने भूमि की सिंचाई हेतु ‘फिरोजरज्बा’, ‘अलुधखनी’ नामक दो नहरों का निर्माण कराया. बड़े-बड़े उद्यान लगवाए.

सल्तनतकाल में सामान्यतः उपज का 33% भू-राजस्व के रूप में वसूल किया जाता था, किन्तु अलाउद्दीन खलजी और मुहम्मद तुगलक ने उपज का 50% भू राजस्व के रूप में वसूल किया. फिरोज तुगलक ने भूमि कर के साथ सिंचाई कर लगाया. जिसकी दर उपज का 1/20 भाग थी. इस कर को वे किसान देते थे, जो सिंचाई हेतु नहरों का पानी प्रयोग में लाते थे.

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