सनी देओल का फैन विकास दुबे कैसे बना ‘विकास पंडित’, कहानी पूरी फिल्‍मी है

सनी देओल का फैन विकास दुबे कैसे बना ‘विकास पंडित’, कहानी पूरी फिल्‍मी है

 

JMKTIMES! हिस्ट्री शीटर विकास दुबे, (kanpur encounter)  जो उत्तर प्रदेश पुलिस से दूर चल रहे हैं, को भी फिल्म देखने का बहुत शौक है। उन्हें अभिनेता सनी देओल की कुछ फिल्में पसंद हैं। उनकी सबसे पसंदीदा फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ है। दुबे को फिल्म इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसका नाम भी विकास पंडित रख दिया। उसके साथ रहने वाले गुर्गे उसे पंडित कहकर पुकारने लगे। जिलों सहित आसपास के गांवों में लोग उन्हें विकास पंडित के रूप में संबोधित करने लगे। इनमें चौबेपुर थाने के एसएचओ से लेकर कांस्टेबल तक शामिल थे।



1999 में रिलीज़ हुई फिल्म अर्जुन पंडित में गैंगस्टर की भूमिका निभाई। यह वही दौर था जब विकास दुबे ने फिल्म जगत में प्रवेश किया। विकास दुबे की कहानी भी एक फिल्म थी। वही फिल्म सबसे ज्यादा पसंद की गई, जिसमें किसी ने खलनायक की भूमिका निभाई हो और उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो। ‘अर्जुन पंडित’ देखने के बाद, जब उनके गुर्गे ने विकास पंडित को बुलाया, तो उनका चेहरा खुशी से चमकने लगा। दुबे  ने सैकड़ों बार इस मूवी को देखा था।




दबंग विधायक ने दिया राजनीतिक संरक्षण

1996 में विकास दुबे चौबेपुर विधानसभा से दबंग विधायक हरिकिशन श्रीवास्तव के संपर्क में आया था। विकास (kanpur encounter) को यह पहला राजनीतिक संरक्षण मिला था। विकास ने विधायक के लिए काम करना शुरू कर दिया। विधायक के जो काम कोई नहीं कर पाता था, उसे विकास चुटकियों में कर देता था। जमीन कब्जा करना, रंगदारी वसूलना इस तरह के कामों से विकास विधायक का करीबी बन गया।



मंत्री की हत्‍या के बाद बना मोस्‍टवांटेड

1999 के बाद से कानपुर और आसपास के इलाकों में विकास दुबे का खौफ बढ़ता चला गया। 2001 में शिवली थाने में यूपी के दर्जा प्राप्त तत्कालीन मंत्री संतोष शुक्ला की हत्या करने के बाद वह मोस्टवांटेड विकास पंडित बन गया। क्राइम की दुनिया में लोग उसे विकास पंडित के नाम से पुकारने लगे। विकास के रिश्तेदार और सगे संबंधी भी उसे पंडित के नाम से बुलाने लगे।

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‘पंडित मतलब रंगदारी’

चौबेपुर थाने के निलंबित एसएचओ विनय तिवारी और चौकी इंचार्ज समेत सिपाही भी विकास दुबे  (kanpur encounter) को पंडित कह कर पुकारते थे। इसके साथ ही जब उसे किसी से रंगदारी वसूलना होता था तो वह फोन पर सिर्फ ‘पंडित’बोलता था, दूसरी तरफ मौजूद शख्स समझ जाता था कि रंगदारी के लिए फोन आया है। इसके बाद उसके गुर्गे रंगदारी वसूलने जाते थे।



 

 

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