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  • लाइपेज, वसा को वसा अम्लों एवं ग्लिसरोल में परिवर्तित कर देता है।

 

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  • व्हेल और सील में त्वचा की वसा एक मोटी परत ‘ब्लूबर’ बना लेती है जो न केवल खाने का संचयन करती है बल्कि शरीर के तापमान को भी नियंत्रित रखती है।
  • भोजन, इलियम में पहुँचकर आंत्र रस में मिलता है।
  • आंत्र में माल्टेज, माल्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है।
  • लेक्टेज, लेक्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता
  • सुक्रेज, सुक्रोज को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • ट्रिप्सिन, पेप्टाइडस का अमीनो अम्लों में परिवर्तन करता है।
  • अब भोजन काइल (Chyle) कहलाता है।
  • इलियम की आंतरिक सतह पर अंगुलीनुमा उभार पाए जाते हैं जिन्हें विलई (villi) कहते हैं।
  • प्रत्येक विलई पर रुधिर वाहिनियों और लिम्फ वाहिनियों का जाल बिछा होता है जो भोजन के अवशोषण में सहायता करता है।
  • पचा हुआ भोजन बड़ी आंत्र में प्रवेश करता है।
  • बड़ी आंत भोजन का अवशोषण नहीं कर सकती
  • लेकिन जल का अवशोषण करती है।

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  • शेष बचा हुआ ठोस वर्ण्य पदार्थ विष्ठा कहलाता है और मलाशय में पहुँचता है।
  • यह मलद्वार के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।
  • मनुष्य में 32 स्थायी दाँत होते हैं जो चार प्रकार के होते हैं।
  • कृतक दाँत संख्या में चार होते हैं तथा भोजन कुतरने का कार्य करते हैं।
  • दनक दाँत संख्या में दो होते हैं तथा भोजन को चीरने फाड़ने का कार्य करते हैं।
  • अग्रचर्वणक दाँत संख्या में चार होते हैं तथा भोजन को
  • चबाने तथा दबाने का कार्य करते हैं।
  • चर्वणक दाँत संख्या में 6 होते हैं तथा भोजन चबाने
  • का कार्य करते हैं।
  • हाथी के रद उपरी जबड़े के दूतक दाँत होते हैं।
  • सूअर एवं घोड़े में दाँतों की संख्या सर्वाधिक होती है।
  • दाँतों का इनेमल शरीर का सबसे कठोर भाग होता है।
  • दाँतों का अधिकांश भाग डेंटाइन का बना होता है।
  • उच्च, बहुकोशिकीय जंतुओं में आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति एवं अनावश्यक पदार्थों का बहिष्करण सीधे कोशिका द्वारा नहीं होता, इसलिए इन्हें एक परिवहन तंत्र की आवश्यकता होती है जिसे परिसंचरण तंत्र  कहते हैं।
  • परिसंचरण तंत्र पोषक पदार्थों, जैसे-ग्लूकोज, वसीय  अम्ल, विटामिन आदि, का अवशोषण कर केंद्र से शरीर के विभिन्न भागों तक परिवहन करता है।
  • यह नाइट्रोजनी वर्ण्य पदार्थों, जैसे-अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि, का शरीर के विभिन्न भागों से उत्सर्जी अंगों तक परिवहन करता है।

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  • हार्मोन का अंतः स्रावी ग्रंथि से लक्षित अंगों तक परिवहन करता है।
  • फेफड़ों से शरीर की कोशिकाओं एवं ऊतकों तक ऑक्सीजन का परिवहन करता है।
  • रुधिर परिवहन तंत्र तीन अवयवों-हृदय, रुधिर नलिकाओं व रूधिर-का बना होता है।
  • रुधिर नलिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं।
  • धमनियाँ मोटी भित्तियुक्त रुधिर नलिकाएँ हैं।
  • ये रुधिर को हृदय से विभिन्न अंगों में पहुँचाती हैं। .
  • ये शरीर में गहराई में स्थित होती हैं तथा इनमें वाल्व का अभाव होता है।
  • फुफ्फुस धमनी के अतिरिक्त सभी धमनियों में ऑक्सीकृत (शुद्ध) रुधिर प्रवाहित होता है।
  • धमनियों में रुधिर अधिक दाब एवं अधिक गति से बहता है।
  • शिराएँ पतली भित्ति वाली रुधिर नलिकाएँ हैं।

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  • ये विभिन्न अंगों से रुधिर को हृदय तक ले जाती हैं।
  • ये शरीर में अधिक गहराई में नहीं होती तथा इनमें रुधिर की विपरीत गति को रोकने हेतु वाल्व पाए जाते
  • इनमें रुधिर कम दाब एवं कम गति से बहता है।
  • फुफ्फुस शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अनॉक्सीकृत रुधिर प्रवाहित होता है।
  • वाहिनियाँ सबसे पतली रुधिर नलिकाएँ हैं जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं।
  • प्रत्येक वाहिनी चपटी कोशिकाओं की एक परत से बनी होती है।
  • ये पोषक पदार्थों, वर्ण्य पदार्थों, गैस आदि पदार्थों का रुधिर एवं कोशिका के बीच में आदान-प्रदान करने में सहायक हैं।
  • रुधिर लाल, संवहनी (Vascular), संयोजी ऊतक है जिसमें रुधिर कणिकाएँ, प्लाज्मा, हीमोग्लोबिन, प्लाज्मा प्रोटीन आदि उपस्थित होती हैं। , खुले परिसंचरण तंत्र में रुधिर कुछ समय के लिए  रुधिर नलिकाओं में उपस्थित रहता है तथा अंत में रुधिर नलिकाओं से खुले स्थान में आ जाता है। , इस प्रकार का रुधिर परिसंचरण तिलचट्टा, प्रॉन,कीट, मकड़ी आदि में पाया जाता है।
  • इस तंत्र में रुधिर कम दाब एवं कम वेग से बहता है।
  • तिलचट्टे में रुधिर परिसंचरण चक्र 5-6 मिनट में पूर्ण होता है।
  • बंद परिसंचरण तंत्र केंचुएं, नेरिस, मोलस्क एवं सभी कशेरुकियों में पाया जाता है। रुधिर बंद नलिकाओं में बहता है। इसमें रुधिर अधिक दाब एवं अधिक वेग से बहता है।
  • इसमें पदार्थों का आदान-प्रदान ऊतक द्रव्य द्वारा होता
  • हृदय एक मोटा, पेशीय, संकुचनशील स्वतः पंपिंग अंग है।

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  • इसका वह भाग जो शरीर के ऊतकों से रुधिर ग्रहण करता है, अलिंद (Auricle) कहलाता है तथा वह भाग जो ऊतकों में रुधिर पंप करता है, निलय (Vertriple) कहलाता है।
  • मछलियों में केवल दो कोष्ठीय (Two chambered) हृदय पाया जाता है जिसमें एक अलिंद एवं एक । निलय होता है।
  • उभयचरों में तीन कोष्ठीय हृदय होता है।
  • सरीसृपों का हृदय संरचना में तीन कोष्ठीय तथा कार्य में चार कोष्ठीय (Four chambered) होता है।
  • पक्षियों एवं स्तनियों में हृदय चार कोष्ठीय होता है जिसमें दो अलिंद एवं दो निलय होते हैं।
  • सभी मनुष्यों का हृदय लगभग समान आकार का होता
  • पुरुषों में हृदय का औसत वजन 280-340 ग्राम तथा महिलाओं में 230-280 ग्राम होता है।
  • नवजात शिशु के हृदय का वजन लगभग 20 ग्राम  होता है।
  • हृदय, वक्ष गुहा में दोनों फेफड़ों के बीच में स्थित होता है।
  • हृदय के चारों ओर द्विकलायुक्त कोष पाया जाता है। यह कला पेरीकार्डियम कहलाती है। दोनों कलाओं के बीच में पेरीकार्डियल द्रव से भरी एक गहा पाई जाती है।

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