Ctet Child Development And Pedagogy Notes

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Ctet Child Development And Pedagogy Notes

प्रक्षेपण प्रविधियाँ (Projective Techniques)

मूल्यांकन की प्रक्षेपण प्रविधियों के माध्यम से व्यक्ति  (pedagogy notes for ctet) के व्यक्तिगत सामाजिक समायोजन से सम्बन्धित पक्षों का मूल्यांकन किया जाता है। इनमें व्यक्ति अपनी भावनाओं का प्रक्षेपण करता है और उन प्रक्षेपणों का मूल्यांकन निश्चित सिद्धान्तों व नियमों के माध्यम से किया जाता है। इस प्रकार प्रक्षेपण का अर्थ अपने विचारों, भावों व कमियों.को अन्य व्यक्तियों या पदार्थों के माध्यम से व्यक्त करना है।

 

 

फ्रीमैन ने लिखा है-“प्रक्षेपण प्रविधि में सामान्य रूप से व्यक्ति के सामने जो उद्दीपक प्रस्तुत किया जाता है, इस तरह उसे ऐसा अवसर दिया जाता है कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन में छिपे हुए तथ्यों को इन उद्दीपक विधियों के माध्यम से अभिव्यक्त करे।” प्रक्षेपण प्रविधियों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है

(a) टी. ए. टी. (T. A. T.)

T. A. T. का पूरा नाम Thematic Apperception Test (प्रसंगात्मक बोध परीक्षण) है, जिसका निर्माण 1935 में मरे व मोर्गन ने किया। इस परीक्षण में कार्डों की संख्या 30 होती है तथा 1 साधारण कार्ड होता है। यह परीक्षण प्रौढ़ों के लिए उपयोगी है। इसमें दैनिक जीवन की क्रियाओं से सम्बन्धित कालो चित्र होते हैं। इस परीक्षण में 30 चित्र होते हैं।

10 चित्र लड़कों के लिए, 10 चित्र लड़कियों के लिए तथा 10 चित्र लड़के व लड़की दोनों के लिए । टी. ए. टी. का प्रशासन व्यक्तिगत व सामूहिक दोनों प्रकार से किया जा सकता है। इसमें एक व्यक्ति को दो बार में 20 चित्र दिखाये जाते हैं तथा उन चित्रों के आधार पर, कहानी लिखने के लिए कहा जाता है। वह व्यक्ति साधारणतः अपने को चित्र का कोई पात्र मान लेता है। उसके बाद वह कहानी कहकर, अपने विचारों, भावनाओं, समस्याओं आदि को व्यक्त करता है।

 

यह कहानी स्वयं उसके जीवन की होती है। इस प्रकार टी. ए. टी. के माध्यम से किसी प्रयोज्य (Subject) के द्वारा कहानी में व्यक्त अतृप्त इच्छाएँ, मन के संघर्ष, अनुभव, अभिवृत्तियाँ आदि संवेग परिलक्षित होते हैं, जिनके आधार पर प्रयोज्य की मनःस्थिति का उपचार किया जाता है। इस विधि द्वारा सामान्य व स्नायु- दौर्बल्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व का आंकलन भी किया जा सकता है।

(b) सी. ए. टी. (C. A. T.)

सी. ए. टी. (C. A. T.) का पूरा नाम ‘बालक बोध परीक्षण’ (Children Apperception Test) है। इस प्रविधि का निर्माण 1948 में लियोपोल्ड बैलक (Leopold Bellak) ने किया । यह परीक्षण 3 से 11 वर्ष की आयु के बालकों पर प्रशासित किया जा सकता है। इस परीक्षण में 10 चित्र होते हैं। इन चित्रों में जानवरों के व्यवहार उसी तरह प्रदर्शित होते हैं, जैसे मानव व्यवहार । इन चित्रों को बालक के समक्ष एक-एक करके प्रदर्शित किया जाता है तथा बालक से चित्रों का कथानक पूछा जाता है।

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इन चित्रों के माध्यम से बालकों की अनेक समस्याएँ, जैसे परिवार सम्बन्धी, सफाई सम्बन्धी, माता-पिता, भाई-बहनों व मित्रों के साथ सम्बन्ध, संघर्ष, प्रतियोगिता, तनाव आदि के बारे में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। सी. ए. टी. में एक चार्ट दिया हुआ होता है जिस पर प्रयोज्य का विवरण, प्रशासन के निर्देश, सभी 10 कहानियाँ लिखने हेतु रिक्त स्थान, विश्लेषण व अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्धों तथा आवश्यकताओं का वर्णन करने के लिए भी रिक्त स्थान दिया हुआ होता है। इस परीक्षण से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण करके प्रयोज्य की समस्याओं का समाधान किया जाता है। भारत में इस परीक्षण का संशोधन व अनुकूलन कलकत्ता की उमा चौधरी ने सन् 1960 में किया है।

(c) रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण (Rorschach Ink Blot Test)—

इस परीक्षण का निर्माण 1921 में एक स्विस मनोचिकित्सक हरमन रोर्णा ने किया। इस परीक्षण के माध्यम से मानसिक रोगों का निदान व उपचार किया जाता है। इस परीक्षण में प्रयोज्य को 10 स्याही के धब्बों का चित्र दिखाया जाता है जो प्रत्येक कार्ड पर अलग-अलग रूप का होता है। प्रयोज्य को इन चित्रों के प्रति प्रतिक्रिया करनी होती है। स्याही के धब्बों के चित्रों के माध्यम से व्यक्ति अपने अचेतन मन को अर्थपूर्ण शब्दों में व्यक्त करता है।

इस परीक्षण में प्रयोज्य मनोवैज्ञानिक तत्त्वों के प्रति सामंजस्य (Adaptation), प्रक्षेपण (Projection) तथा अभिव्यक्ति (Expression) करता है। इस प्रकार इस परीक्षण के माध्यम से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के ज्ञानात्मक, क्रियात्मक व भावात्मक पक्षों के आंकलन का अवसर मिलता है। इस परीक्षण की उपयोगिता के सन्दर्भ में क्रो व क्रो ने लिखा है-‘धब्बों की व्याख्या करके परीक्षार्थी अपने व्यक्तित्व का सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत कर देता है।” मोन्स ने लिखा है—”रोर्शा का उद्देश्य समग्र व्यक्तित्व के सम्बन्ध में सूचना देना

(d) वाक्य-पूर्ति परीक्षण (Sentence Completion Test)

वाक्य-पूर्ति परीक्षण का प्रयोग मानसिक रोगों व व्यक्तिगत समस्याओं का निदान व उपचार करने के लिए किया जाता है। इस परीक्षण के माध्यम से छात्रों को शैक्षिक, व्यक्तिगत व व्यावसायिक निर्देशन भी दिया जा सकता है। । वाक्य-पूर्ति परीक्षण का सूत्रपात पाइन (Pyen) ने किया । टेण्डर (Tender) ने इस परीक्षण को 1930 में सर्वप्रथम प्रकाशित किया।

उन्होंने इस परीक्षण को संवेगात्मक अन्तर्दृष्टि परीक्षण कहकर सम्बोधित किया। सन् 1938 में कैमरोन ने सामान्य बालकों, सामान्य प्रौढ़ों व मनोविकृतिगस्त वृद्धों पर वाक्य-पूर्ति का एक अध्याय प्रकाशित किया, जिसमें 15 अपूर्ण वाक्य थे। सन् 1941 में लार्ज (Lorge) और थार्नडाइक (Thorndike) ने 240 अपूर्ण वाक्यों के द्वारा एक अध्याय प्रकाशित किया ।

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1946 में सेनफोर्ड (Sanford) ने 30 अपूर्ण वाक्यों का एक प्रयोग प्रकाशित किया। सन् 1943 में रहोड़ ने अत्यन्त छोटे पदों वाले वाक्य-पूर्ति परीक्षण को प्रकाशित किया। इस प्रविधि में प्रयोज्य द्वारा वाक्य-पूर्ति परीक्षण को शीघ्रता से भरना होता है। इसमें यह माना जाता है कि वाक्य-पूर्ति में प्रयोज्य उन्हीं शब्दों का प्रयोग करता है जो उसकी इच्छा, भय, तनाव, हीन भावना, डर आदि के संवेगों को व्यक्त करते हैं।

युद्ध काल में सैनिक अस्पतालों में होल्जबर्ग एवं अन्य व्यक्तियों ने एक परीक्षण प्रयुक्त किया, जिसका नाम आत्म-विचार पूर्ति परीक्षण था। इस परीक्षण के निर्देशानुसार, प्रयोज्य से अपनी वास्तविक भावनाओं को व्यक्त करने हेतु वाक्यों की पूर्ति करने के लिए कहा
जाता है।

 

(e) शब्द-साहचर्य विधि (WordAssociation Method)

शब्द-साहचर्य विधि का उपयोग व्यक्तित्व ग्रन्थियों, सांवेदनिक उद्वेगों एवं अपराध का पता लगाने में किया जाता है। मानसिक रोगों के उपचार व निदान में भी इसका प्रयोग किया जाता है। शब्द-साहचर्य विधि का प्रथम वैज्ञानिक प्रयोग गाल्टन ने सन् 1879 में किया । गाल्टन ने 75 शब्दों की एक सूची बनायी. व इसका प्रयोग स्वयं पर किया ।

उसने पाया कि कुछ परिस्थितियों में उसे शब्दों के स्थान पर मानसिक चित्रों व प्रतिमाओं का स्मरण होता था। साहचर्य काल के मापन के लिए गाल्टन ने क्रोनोमीटर का प्रयोग किया। तदनन्तर गाल्टन ने इन साहचर्य शब्दों का विश्लेषण किया तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि अनेक प्रतिक्रियात्मक साहचर्य शब्दों का स्रोत बाल्यकाल व किशोरावस्था थी। इससे पता चला कि भावी व्यक्तित्व के विकास में बाल्यकाल व किशोरावस्था का अत्यन्त महत्त्व है।

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सन् 1880 में विलियम वुण्ड ने लिपिजिंग विश्वविद्यालय में इसी आधार पर साहचर्य सम्बन्धी प्रयोग किये। वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भ में युंग ने व्यक्तित्व ग्रन्थियों का पता लगाने के लिए साहचर्य विधि का प्रयोग किया। उसने 100 ऐसे शब्दों की सूची बनायी, जिनसे संवेगात्मक ग्रन्थियों का पता चल सके। युग के अतिरिक्त एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन केण्ट-रोजनोफ (Kent Rosanoff) का है। इन्होंने भी अपनी सूची में 100 शब्दों को प्रयुक्त किया ।

शब्द-साहचर्य विधि में प्रयोज्य के समक्ष उद्दीपक शब्दों को प्रस्तुत करते हैं और उत्तरस्वरूप प्रयोज्य कुछ अन्य शब्दों से प्रतिक्रिया करता है। साहचर्य मुख्यतः दो प्रकार का होता है—

(1) मुक्त साहचर्य (Free Association),

(2) नियन्त्रित साहचर्य (Controlled Association)।

मुक्त साहचर्य में उद्दीपक शब्द की प्रतिक्रियास्वरूप प्रयोज्य के मन में जो शब्द आता है, उसे वह निःसंकोच कह देता है, वह किसी भी शब्द द्वारा प्रतिक्रिया करने में स्वतन्त्र होता है। किसी विशेष विधि द्वारा उसकी प्रतिक्रिया को सीमित नहीं करते हैं, जबकि नियन्त्रित साहचर्य में प्रतिक्रिया का स्वरूप पहले से निश्चित होता है। उदाहरणस्वरूप-प्रयोज्य को यह निर्देश दे सकते हैं कि वह प्रतिक्रिया में उद्दीपक का कोई अंश शब्द कहे, जैसे-‘जेल’ शब्द बोलने पर कैदी। इस प्रकार इस विधि में प्रयोज्य की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करके तत्सम्बन्धी निर्णय लिये जाते हैं।

अतः उपरोक्त आधार पर कहा जा सकता है कि परीक्षण प्रक्रियाओं में बालक के व्यक्तित्व, बुद्धि व अनेक शीलगुणों का मापन परीक्षा के माध्यम से किया जा सकता है। स्वयं आलेख प्रविधियों के माध्यम से बालक से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सूचनाएँ ली जाती हैं।

निरीक्षणात्मक विधियों में बालक के सम्बन्ध में उसके निरीक्षणों व अनुभवों के आधार पर सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। प्रक्षेपण  प्रविधियों में बालक के मन में छिपी व दमित इच्छाओं, भावनाओं, संवेगों व मनोवृत्तियों को इन परीक्षणों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।

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