UKSSSC STUDY MATERIAL

UKSSSC-LDO-NOTES

UKSSSC STUDY MATERIAL

 

शरीर के किसी भी अंग या तंत्र में जब सामान्य (UKSSSC LDO NOTES) कार्य तथा कार्यिकी न हो रही ।हो तो उसे हम रोग (Disease) कहते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति वह है जो शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से स्वस्थ हो।

 

 

रोग का कीटाणु सिद्धांत (Germ Theory of Disease)

रॉबर्ट कोच (Robert Koch, 1876) ने प्रमाणित किया कि पशुओं में एंथ्रेक्स (Anthrax) रोग जीवाणुओं के कारण होता है। रोगी पशुओं के शरीर से रक्त लेकर उन्होंने स्वस्थ पशुओं के सीरम पर एंथ्रेक्स जीवाणु (बैसिलस एंथ्रेकिस, Bacillus anthracis) को संवर्धित किया। इस संवर्धन को स्वस्थ पशुओं के शरीर में प्रवेश कराने पर उन्होंने पाया कि वे ये पशु एंथ्रेक्स रोग से पीड़ित हो गए। इस प्रकार उन्होंने रोग के कीटाणु सिद्धांत की स्थापना की।

रोग के संक्रमण का अर्थ है-रोग का फैलना। अतः संक्रामक रोग फैलने के लिए रोगाणुओं का शरीर में पहुँचना आवश्यक है। ये रोगाणु शरीर में मुख्यतः निम्न विधियों से फैलते हैं

 

प्रत्यक्ष रूप से (Directly)

(i) संक्रमित व्यक्ति और स्वस्थ व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से

(ii) खांसी, छींक, थूक, बातचीत करने के माध्यम से

(iii) धूल के संपर्क में आने से

(iv) जंतु के काटने से

(v) माता से शिशु में (प्लेसेंटा से)।

अप्रत्यक्ष रूप से (Indirectly)

वेक्टर या रोग वाहक (Disease Carrier or Vector) द्वारा

रोगाणु किसी अन्य जीव द्वारा एक जीव से दूसरे जीव में (UKSSSC LDO NOTES)  संचरित होते हैं, जैसे- एनाफिलीज मादा मच्छर प्लाज्मोडियम को एक मनुष्य से दूसरे में पहुँचाता हैं।

वायु (Air) द्वारा

सूक्ष्म जीवाणु (रोगाणु) एक मनुष्य से दूसरे में संचरित होते हैं।

संक्रमणी पदार्थ (Fomites) द्वारा

संदूषित पदार्थों द्वारा, जैसे-वस्त्र, खिलौने, दरवाजे के हैंडिल, साबुन, तौलिया, कंघा, शल्य चिकित्सा के यंत्र, सिरिंज आदि। गंदे हाथों तथा अंगुलियों (Uncleaned Hands and Fingers) द्वारा इनके द्वारा भी अनेक रोग संचरित होते हैं।

अन्य माध्यम (Vehicle)

जल, बर्फ, भोजन, खाद्य पदार्थ, रुधिर आदि द्वारा।

रोगों के प्रकार (Types of Diseases)

जन्मजात रोग (Congenital diseases)

वे रोग जो जन्म के समय से ही शरीर में रहते हैं, उन्हें जन्मजात रोग कहते हैं। । ये रोग उपापचयी या विकासीय अनियमितताओं के कारण फैलते हैं। इन रोगों का आक्रमण गर्भावस्था में होता है। होंठ का कटना (Harelip), विदीर्ण तालु (Cleft Palate) और पांव का फिरा होना (Club foot) आदि जन्मजात रोग के उदाहरण हैं। जन्मजात रोग निषेचित अंडाणु की गुणसूत्रीय संरचना में कमी या गर्भाशय में स्थित शिशु पर आघात पहुँचने के कारण भी होता है। गुणसूत्रों में असंतुलन के कारण मॉन्गोलिज्म (Mongolism), हृदय विकृति के कारण नील शिशु का जनन, तंत्रिका की असामान्यता के कारण स्थानिक अधरांगता आदि जन्मजात रोग होते हैं।

उपार्जित रोग (Acquired diseases)

वे रोग जो जन्म के पश्चात् विभिन्न कारकों के कारण उत्पन्न होती हैं, उन्हें उपार्जित रोग कहते हैं।  उपार्जित रोग दो प्रकार के होते हैं

संक्रामक रोग या संसर्ग रोग (Communicable Diseases or Infectious Disease)

यह हानिकारक सूक्ष्म जीवों (रोगाणुओं) के कारण होता है, उदाहरणतः जीवाणु, विषाणु, कवक एवं प्रोटोजोआ। रोग लारक जीव का संचारण वायु, जल, भोजन, रोगवाहक कीट तथा शारीरिक संपर्क के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होता है। इसीलिए, इन्हें संचरणीय या संक्रामक रोग कहते हैं।

बर्ड फ्लू

बर्ड फ्लू, बर्ड इंफ्लूएंजा (फ्लू) विषाणु के संक्रमण से होने वाली (UKSSSC LDO NOTES)  बीमारी है। यह विषाणु जंगली पक्षियों की आँतों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। आमतौर पर ये पक्षी इसके कारण बीमार नहीं होते। परन्तु, इस विषाणु के संपर्क में आने पर पालत पक्षी, मुर्गी, चूजे, बत्तख आदि बीमार हो जाते हैं और मर जाते हैं। इन्हीं पालतू पक्षियों से या मुर्गियों आदि के सेवन से यह विषाणु मनुष्य में पहुँच जाता है
और वह रोगग्रस्त हो जाता है।

बर्ड इंफ्लूएंजा विषाणु A (H 5 N1) क्या है ?

इसे H 5 N 1 विषाणु के नाम से जाना जाता है। पक्षियों में पाए जाने वाले सभी प्रकार के इंफ्लूएंजा विषाणुओं में ये सबसे ज्यादा स्पर्श-संचारक (Contagious) होता है और खतरनाक साबित हो सकता है।

बर्ड इंफ्लूएंजा विषाणु कितने प्रकार के होते हैं ?

सैद्धांतिक रूप से इंफ्लूएंजा A विषाणु 9 प्रकार के होते हैं- H1, H2, H3,  H4, H5, H6, H7, H8, व H9. इन सभी के नौ-नौ सबटाइप हैं-

H5 N1, H5, N2, H5 N3, H5 N4, H5N5, H5N7, H5N8, H5N9. इन विषाणुओं में पाई जाने वाली 9 न्यूरामिनिडेज आधारीय प्रोटीन के अलग-अलग रूपों के कारण ही ये विषाणु 9 अलग-अलग प्रकार के होते हैं।

बर्ड फ्लू विषाणु और मानव फ्लू विषाणु में क्या अंतर है ?

 

टाइप A इंफ्लूएंजा विषाणु के कई सबटाइप होते हैं। टाइप A विषाणु की सतह पर पाई जाने वाली अलग-अलग प्रोटीन (HA-Hemagglutinin) और I (NA- Neuraminidase), के कारण ये सबटाइप कई प्रकार के होते हैं।

टाइप A विषाणु में HA प्रोटीन के 16 और NA प्रोटीन के 9 सब टाइप होते हैं। इस कारण इनके योग से कई प्रकार के जोड़े संभव हैं। ये सभी प्रकार पक्षियों में पाए जाते हैं। बर्ड फ्लू के बारे में जब भी बात की जाती है तो इसका अर्थ टाइप A इंफ्लूएंजा विषाणु होता है। जब हम मानव फ्लू की बात करते हैं तो इसका अर्थ आमतौर पर मनुष्यों में पाए जाने वाले फ्लू से होता है (यह बात उल्लेखनीय है कि बर्ड फ्लू से मनुष्य तो संक्रमित हो जाते हैं, मानव फ्लू से पक्षी नहीं)। अभी तक मानव फ्लू A विषाणु के केवल 3 सबटाइप ही ज्ञात हैं-HIN1, HIN2 और H3N2। टाइप A विषाणु समय के साथ खुद को बदलता रहता है और इसलिए ज्यादा खतरनाक होता है।

बर्ड फ्लू के लक्षण क्या हैं ?

जिस पक्षी को बर्ड फ्लू होता है, उसका फेफड़ा और खाद्य नली सबसे पहले संक्रमित होती है। पक्षी का सिर व आँख फूलने लगती है और नाक से लगातार पानी गिरता है। खाद्य नली के संक्रमित होने के कारण पक्षी खाना नहीं खा सकता। संक्रमण के 10-15 दिन के भीतर ही पक्षी की मौत हो जाती है। मनुष्य में खाँसी, गले में सूजन एवं दर्द, मांसपेशियों में दर्द, आँखों में संक्रमण, सांस लेने में कठिनाई आदि बर्ड फ्लू के लक्षण हैं। संक्रमण मुख्यतः हाथ के जरिये, छूने से, सांस से, आँख, नाक आदि से शरीर में होता है।

मानव बर्ड फ्लू से कैसे संक्रमित होता है?

संक्रमित पक्षी की लार, त्याजन, पंख आदि में यह विषाणु रहते हैं। (UKSSSC LDO NOTES)  इन 5 पक्षियों की त्याजन से दूषित मृदा के सम्पर्क में आने पर कोई भी पक्षी इस विषाणु से संक्रमित हो जाता है और वाहक का कार्य करता है। मनुष्य इसी तरह के पक्षियों के संपर्क में आने पर संक्रमित हो जाता है। आमतौर पर यह संक्रमण मुर्गी फार्म उत्पादों से मनुष्य तक पहुँच जाता है।

क्या इसका इलाज संभव है ?

5 वर्तमान में बर्ड फ्लू की कोई वैक्सीन नहीं है। आमतौर पर दो एंटीवाइरल ।

एमंटाडीन और रिमंटाडीन को पक्षियों में बर्ड फ्लू फैलने से रोकने के लिए प्रयुक्त किया जाता है परन्तु मनुष्यों के लिए अभी तक कोई भी प्रभावशाली दवा उत्पादन की स्थिति में नहीं है। इसकी वैक्सीन पर प्रयोगशाला में कार्य चल रहा है।

असंक्रामक रोग (Non-communicable Diseases)

ये रोग रोगी व्यक्ति तक ही सीमित रहते हैं अर्थात् एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संचरित नहीं होते हैं। ये रोग इन कारणों से हो सकते

(i) आहार में सामान्य आवश्यक तत्वों, जैसे-लवण, विटामिन आदि, की कमी से

(ii) पाचन-तंत्र के किसी भाग में ऊतकों की अनियमित वृद्धि से

(iii) पाचन-तंत्र में विकार उत्पन्न होने से

(iv) अंतःस्रावी तंत्र में विकार उत्पन्न होने से

(v) शरीर के किसी भाग की दुर्घटना में क्षति पहँचने से असंक्रामक रोगों के प्रकार

(i) ह्वासित रोग (Degenerative Diseases)

(ii) हीनताजन्य रोग (Deficency Diseases)

(iii) एलर्जी (Allergy)

(iv) कैंसर (Cancer)

(v) आनुवंशिक रोग (Genetic Diseases)

(vi) सामाजिक रोग (Social Diseases)

(vii) मानसिक रोग (Psycholocial Diseases)

ALSO REAC UKSSSC LDO NOTES IN PDF

हासित रोग (Degenerative Diseases)

 

 

इसमें मस्तिष्क व हृदय व अन्य अंगों के असंक्रमणीय रोग आते हैं जिनकी संभावना आयु बढ़ने के साथ बढ़ती है। धीरे-धीरे आयु के साथ-साथ अंगों की कार्यक्षमता भी अनेक कारणों से कम हो जाती है। हृदय के रोग, मधुमेह व जोड़ों का दर्द इसी प्रकार के रोग हैं।

हृदय के रोग (Heart Diseases)

हृद्वाहिका तंत्र का न्यूरोसिस (Neurosis of Cardiovascular System)

मनुष्य की उच्च तंत्रिकीय क्रिया या दिमाग के सामने अचानक कोई (UKSSSC LDO NOTES) खतरा या बहुत कठिन समस्या आ पड़े तो यह रोग हो जाता है। हृद्वाहिका तंत्र की कार्यविधि बिगड़ जाती है। किसी भी प्रकार का मानसिक आघात कॉर्टेक्स की कार्यविधि खराब कर सकता है जिससे सब-कॉर्टेक्स के तंत्रिकीय यंत्रवर्षी तंत्रिका तंत्र का नियंत्रण खो बैठते हैं। इससे हृद्वाहिका तंत्र की सामान्य कार्यविधि बिगड़ जाती है। रोगी को नींद नहीं आती, वह चिड़चिड़ा हो जाता है। रोगी को शांत वातावरण, आराम तथा आवश्यक औषधियां देनी चाहिए।

अतितान (Hypertension)

ALSO READ CURRENT AFFAIRS-UPSSSC/UKSSSC/NTPC

इस रोग का मुख्य लक्षण है-उच्च धमनी दाब जो छोटी धमनियों के बहुत देर तक सिकुड़ते रहने के कारण उत्पन्न हो जाता है। इसका मुख्य कारण है-काम करते समय हद से ज्यादा तनाव तथा फिक्र और बुरी खबरों से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का जरूरत से ज्यादा उद्दीपन। रोगी का हौसला बढ़ाने से व सामान्य परिस्थितियों में लाने से रोगी की हालत सुधर सकती है। नींद भी काफी फायदेमंद होती है।

ऐथिरोस्क्ले रोसिस (Atherosclerosis)

इस रोग में धमनियों की दीवारें सख्त हो जाती हैं और उनके अंदर कुछ ऐसे पदार्थ जमा हो जाते हैं जो स्वस्थ शरीर में नहीं पाए जाते, जैसे कैल्शियम कोलेस्टेरॉल। महत्वपूर्ण धमनियों, महाधमनी, हृदय तथा मस्तिष्क की धमनियों के अंदर कोलेस्टेरॉल की थिगलियां आगे चलकर गाढ़ी हो जाती हैं तथा दलिया जैसी हो जाती हैं। इसी कारण इस रोग का नाम ऐथिरोस्क्ले रोसिस (Atherosclerosis; Ather = दलिया) पड़ा है। इन तंग धमनियों में कभी-कभी रुधिर के थक्के जमा हो जाते हैं जिससे रुधिर वाहिनियों के ल्यूमेन बंद हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि ऊतक के संबंधित भाग को रक्त पहुँचना बंद हो जाता है।

हृदपेशी का रोग (Myocardial Infarction)

हृदय की किसी भी धमनी का ल्यूमेन संकुचित अथवा बंद हो जाने से हृपेशी का रोग हो जाता है। परिणामस्वरूप, हृदपेशी के किसी भी भाग को रक्त नहीं पहुँच पाता जिससे वह भाग हृदय की कार्यविधि में भाग लेना बंद कर देता है। रुधिर के अभाव में पेशी का यह भाग धीरे-धीरे नरम होता जाता है और फिर एक दाग का रूप ले लेता है।

हृदुपात (Heart Failure)

हृदुपात तब होता है, जब हृदय के कपाटों में कुछ खराबी आ जाती है या रंध्रों में खराबी आ जाती है जिन्हें ये कपाट बंद करते हैं। इन खराबियों से हृदय की कार्यविधि में परिवर्तन आ जाता है। हृदपात प्रायः गठिया के कारण होता है।

मधुमेह (Diabetes)

अग्न्याशय की कोशिकाएं इंसुलिन हॉर्मोन बनाना बंद कर देती हैं  (UKSSSC LDO NOTES) जिससे शर्करा का उपापचय नहीं हो पाता। अतः पेशाब व रक्त में शर्करा की अत्यधिक मात्रा हो जाती है। रोगी को इंसुलिन के इंजेक्शन नियमित रूप से देने होते हैं।

जोड़ों का दर्द (Arthritis)

इसे गठिया या बाय भी कहते हैं। शरीर के विभिन्न भागों के जोड़ों में दर्द रहता है जिससे चलने-फिरने या काम करने में तकलीफ होती है। कुछ प्रमुख प्रकार के गठिया हैं :

रुहमेटाइड अर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis)

इसका मुख्य कारण है-साइनोसिल झिल्ली में सूजन आना। इसमें कार्टिलेज के ऊपर एक सख्त ऊतक उत्पन्न हो जाता है जिससे चलने-फिरने में कठिनाई होती है।

ऑस्टिओअर्थराइटिस (Osteoarthritis)

40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में प्रायः जोड़ों की कार्टिलेज ह्वासित होने से उनके जोड़ कड़े हो जाते हैं।

गाऊट (Gout)

संधियों में सिट्रिक अम्ल के क्रिस्टल जम जाने से यह बीमारी होती है।

हीनताजन्य रोग (Deficiency Diseases)

यह रोग शरीर में विभिन्न प्रकार के पदार्थों की कमी के कारण होते हैं। इसका विवेचन पहले किया जा चुका है।

एलर्जी (Allergy)

कई लोग किसी पदार्थ के लिए अत्यधिक सुग्राही होते हैं। ऐसे पदार्थों को एलर्जन (Allergens) कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति सभी एलर्जनों के लिए सुग्राही नहीं होता। यही नहीं, वह पहली बार जब एलर्जन के संपर्क में आता है तो प्रतिरक्षी बनती है। परंतु, अगली बार जब वह उसके संपर्क में आता है तो एलर्जन मास्ट कोशिकाओं के साथ संयुक्त हो जाता है। इससे ये कोशिकाएं फट जाती हैं और हिस्टामीन विमुक्त होते हैं जिससे आंखों में पानी, सांस लेने में तकलीफ, त्वचा पर लाल चकते उत्पन्न हो जाते हैं। इसी को एलर्जी कहते हैं।

 
click here in pdf
 

 

 

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

//graizoah.com/afu.php?zoneid=3493311